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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 53
लिङ्गस्य वृत्तपरिधिं दैध्येंणासूत्र्य तत्त्रिधा विभजेत् । मूले तच्चतुरस्रं मध्ये त्वष्टात्रिं वृत्तमतः ॥
लिङ्ग की परिधि को लम्बाई में सूत्र से नाप कर उसके तुल्य पत्थर, लकड़ी या मणि का लिङ्ग बनाना चाहिये। उसको तीन भाग करके मूल का प्रथम भाग चतुरस्र, मध्य भाग अष्टास्त्र और ऊपर का भाग गोल बनाना चाहिये। प्रतिमा के
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