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बृहत्संहिता • अध्याय 58 • श्लोक 15
आस्यं सकेशनिचयं षोडश दैयेंण नग्नजित्प्रोक्तम् । ग्रीवा दश विस्तीर्णा परिणाहाद्विशतिः सैका ॥
नग्रजित् आचार्य ने केशरेखासहित मुख का विस्तार सोलह अंगुल, ग्रीवा का विस्तार दश अंगुल और लम्बाई इक्कीस अंगुल कहा है।
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