मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 96 — अथ शाकुनोत्तराध्यायः

बृहत्संहिता
49 श्लोक • केवल अनुवाद
दिक् (पूर्व आदि और अङ्गारित आदि), देश, चेष्टा, स्वर ( दीप्त और शान्त), दिन, नक्षत्र, मुहूर्त ( शिवा आदि), होरा (राश्यर्ष और कालहोरा), करण, लग्न, अंश, ( द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश), चर (मेष, कर्क, तुला और मकर), स्थिर ( वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ), उन्मिश्न (द्विस्वभाव = मिथुन, कन्या, धनु और मीन) -इन शकुनों का और राशियों का बलाबल जान कर शकुनों के शब्द को जानने वालों को फलकथन करना चाहिये।
एक देश में स्थित पुरुषों के दो प्रकार के कार्य कहे गये हैं, उनमें एक आगामी ( भविष्यत्) और दूसरा स्थिरसंज्ञक (वर्तमान और भूत) होता है। राजा, दूत, गूढ़ पुरुष और परदेश से उत्पन्न कार्य अन्य हैं। उपद्रव तथा बन्धु और मित्रों का आगमनरूप कार्य भविष्यत् होते हैं।
उद्बद्ध (वहीं पर स्थित), संग्रहण (किसी के साथ संयोग), भोजन, चोर, अग्नि, वर्षा, उत्सव, पुत्र, वध, कलह, भय-ये स्थिर वर्ग हैं। यदि ये वर्ग स्थिर स्थान में उत्पन्न स्थिर स्थानस्थित शकुन के द्वारा सूचित किये जाते हों तो चरसंज्ञक होते हैं। यदि ये वर्ग स्थिर हों और उदयकालिक लग्न और चन्द्र स्थिर राशि में हो तो उद्वद्धादि कार्य उसी दिन या भूत में जानना चाहिये और चन्द्र चर राशि में हो और चर स्थानस्थित शकुन हों तो उद्वद्धादि कार्य भविष्य में जानना चाहिये।
स्थिर स्थान, पत्थर, गृह, देवालय, पृथ्वी पर, जल के समीप-इन स्थानों में स्थित शकुन हों तो स्थिर कार्य का शुभाशुभ फल होता है। यदि वे शकुन चल प्रदेश आदि में स्थित हों तो भविष्यत् कार्य के लिये सूचित करते हैं।
जलचर (कर्क, मकर और मौन) लग्न, जलसंज्ञक नक्षत्र (पूर्वाषाढ़ा और शत- भिषा), जलसंज्ञक मुहूर्त, पश्चिम दिशा, जलस्थान-इन स्थानों में तथा पक्षावसान ( अमा और पूर्णिमा) में स्थित प्रदीप्त शकुन शब्द करें तो सभी वृष्टि करने वाले होते हैं। शान्त भी जलचारों शकुन जलादि में स्थित हो तो वृष्टि करने वाले होते हैं।
आग्नेय (पूर्व और दक्षिण) दिशा, आग्नेय (क्रूर मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ) लग्न, अग्नि नामक मुहूर्त, आग्नेय (कृत्तिका) नक्षत्र, आग्नेय देश (अग्नि वाला स्थान) - इन स्थानों में सूर्य से प्रदीप्त होकर शकुन शब्द करें तो अग्निभय होते हैं तथा विष्टि करण, शनि की राशि (मकर और कुम्भ) लग्न में हो और काँटेदार वृक्ष या पत्ररहित लता पर स्थित सूर्य से दोप्त शकुन बैठा हो तो दोष करने वाला होता है।
ग्राम्य, शकुन स्वर और चेष्टा से प्रदीप्त हो, बहुत जोर से शब्द करता हो, काँटेदार वृक्ष पर स्थित हो, मंगल की राशि (सेप और वृश्चिक लग्न में हो, नैऋत्य कोण में ३० ५० दि०-३२ स्थित हो और सम्मुख, वाम या दक्षिण पार्श्व में दिखाई दे तो कलह करता है।
कर्क लग्न में, शुक्र के नवांश में, विदिशा में स्थित होकर दोप्त शकुन नीचे को ओर मुख करके शब्द करे तो उस विदिशा में उक्त स्त्री ('स्त्रीणां विकल्पे बृहती कुमारी' इत्यादि से उक्त स्त्री) के साथ समागम होता है।
पुरुषराशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ) के लग्न में, विषम (१, ३, ५, ७, ११, १३, १५) तिथियों में और पूर्व आदि ( पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर) दिशाओं में पुरुषसंज्ञक दीप्त शकुन हो तो पुरुषों के साथ समागम होता है। मिश्रित ( पुरुषसंज्ञक लग्न में सम तिथि हो या सम राशि के लग्न में विषम तिथि हो तथा विदिशा या दिशा में स्थित पुरुषसंज्ञक दीप्त शकुन) हो तो नपुंसक के साथ समागम होता है।
इसी प्रकार जिस समय नवांश और लग्न में रवि की राशि हो या लग्न में स्वयं सूर्य अवस्थित हो एवं उस समय शकुन शब्द करे तो प्रधान पुरुष के आगमन का कारण होता है।
सभी कार्यों के प्रारम्भ में सूर्ययुत राशि से लग्न राशि तक गिने। जिस राशि में रवि बैठा हो वह सम्पत्, द्वितीय राशि विपत्, तृतीय सम्पत् इत्यादि क्रम से लग्नराशि तक गिने। सम्पत् राशि में कार्य की सम्पत्ति और विपत् राशि में कार्य को विपत्ति जाननी चाहिये।
यदि लग्न से बारहवें स्थान में सूर्य हो तो दाहिनी आँख से काना, चन्द्र हो तो बाई आँख से काना, लग्नस्थित सूर्य पापग्रह (सूर्य, मंगल और शनि) से देखा जाता हो तो अन्धा, सिंह लग्न में स्थित सूर्य हो तो कुबड़ा, बहरा और मूर्ख तथा जिस राशि के लग्न से पापग्रह ( सूर्य, मंगल और शनि)
छठे स्थान में स्थित होकर पापग्रह से देखा जाता हो, उस राशि के सम्बन्धी अङ्ग ( 'कालाङ्गानि वराङ्ग' इत्याद्युक्त अंग ) में व्रणयुत पुरुष का समागम होता है। इस प्रकार जन्म में जो मैंने कहा है, उन सबका इस प्रकरण में विचार करना चाहिये।
अब प्रश्नज्ञान के बाद द्रव्यों (धातु, मूल और जीवों) में लोकप्रसिद्ध अनेक अक्षरों से संगृहीत, इष्ट (नारायण, अर्क, वसिष्ठ, पराशर, मय आदि) से निर्मित, विभागीकृत नामों को केन्द्र के क्रम से कहते हैं।
लग्न, चतुर्थ लग्न, सप्तम लग्न और दशम लग्न में जिस राशि का नवांश हो, उन पर से अपनी-अपनी राशि के
क ख ग घ ङ- मंगल के, च छ ज झ ञ शुक्र के, ट ठ ड ढ ण-बुध के, त थ द ध न-बृहस्पति के, प फ ब भ म-शनि के, य र ल व श ष सह-चन्द्र के और अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः- सूर्य के वर्ग हैं।
द्रेष्काण को वृद्धि से नाम कहते हैं; जैसे-विषम राशि के प्रथम द्रेष्काण में तीन अक्षरों का, द्वितीय द्रेष्काण में पाँच अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में सात अक्षरों का नाम जानना चाहिये। साथ ही सम राशि के प्रथम द्रेष्काण में दो अक्षरों का, द्वितीय द्रेष्काण में चार अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में छः अक्षरों का नाम जानना चाहिये। ग्रहदृष्टि की वृद्धि से नामाक्षर होते हैं। यहाँ पर दो प्रकार से नामाक्षर लाते हैं, प्रथम- स्थितिवश और द्वितीय- दृष्टिवश। दष्टिवश नामाक्षर लाने में दृष्टिवल का विचार क
चर राशि में प्रथम नवांश, स्थिर राशि में पश्चम नवांश और द्विस्वभाव राशि में नवम नवांश वर्गोत्तम संज्ञक हैं। यदि सम राशियों में चर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो दो अक्षरों का, स्थिर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो चार अक्षरों का, विषम राशियों में चर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो तीन अक्षरों का और स्थिर राशि का वर्गोत्तम नवांश हो तो पाँच अक्षरों का नाम होता है। द्विस्वभाव राशियों में राशि की तरह ही नामाक्षरों को भी संख्या होती है। जैसे-द्विस्वभाव राशियों में विषम राशि (मिधुन या धनु) वर्गोत्तम नवांश हो तो तीन या सात अक्षरों का और सम राशि (कन्या या मीन) का नवांश हो तो चार-छ: अक्षरों का नाम होता है।
द्विस्वभाव राशि या सौम्य (बुध) से दृष्ट् द्विस्वभाव राशि में दो नाम कहना चाहिये तथा लग्नराशि में जितने नवांशों की संख्या व्यतीत हो गई हो, उतनी नामाक्षरों की संख्या कहनी चाहिये।
बहुल (विषम राशियों) में नाम के आदि को संयुक्ताक्षर जानना चाहिये। जैसे- श्रीधर, क्षीर, स्मर आदि। कूट (सम राशियों में नाम के अन्त में संयुक्ताक्षर कहते हैं। जैसे-पद्म, धर्म, वत्स आदि। अपने उच्चांश में राशि के योग से एक अक्षर दो बार आता है। यथा-विषम राशि में अपना उच्चांश हो तो प्रथम आदि विषम अक्षर दो बार आता है। जैसे-दरद, दामोदर आदि। यदि सम राशि में अपना उच्चांश हो तो द्वितीय आदि सम अक्षर दो बार आता है, जैसे- देवदत्त, धराधर आदि। लग्नस्थित नवांश राशि में गुरु अक्षर होता है। जैसे- लग्नस्थित नवांश विषम राशि में हो तो नाम का विषम
लग्न से पश्चम या नवम स्थान ग्रहों (सूर्यादि) से युत हो तो नाम के आदि का अक्षर मात्रायुक्त होता है तथा द्रेष्काण के पर्यायतुल्य अक्षर मात्रा से युक्त होता है। यथा-सम राशि का देष्काण हो तो सम अक्षर मात्रायुक्त होता है। जैसे- ईश्वर आदि। विषम राशि का द्रेष्काण हो तो विषम अक्षर मात्रायुक्त होता है, जैसे- श्रीधर आदि। यदि लग्न से दशम स्थान बली हो तो ऊर्ध्व मात्रा से युक्त नाम के आदि का अक्षर श्रीधर, वासुदेव, वैश्रवण, शौण्ड आदि एवं चतुर्थ स्थान बली हो तो अधोमात्रायुत नाम के आदि का अक्षर (सुहिरण्य, शूरवर्मा आदि) और सप्तम स्थान बली हो तो विसर्गयुत नाम के आदि का अक्षर होता है।
शीर्षोदय राशि लग्न में हो तो ऊर्ध्व मात्रा (ओ, औ), पृष्ठोदय राशि लग्न में हो तो अपो मात्रा (उ, ऊ), उभयोदय राशि लग्न में हो तो तिर्यक् मात्रा (ए. ऐ) और दीर्घ राशि (सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक) लग्न में हो तो दीर्घ मात्रा (आ, ई, ऊ, ऐ, ओ, औ) होती है। अन्य राशि (मध्य मिथुन, कर्क, धनु और मकर, हस्व = मेष, वृष, कुम्भ और मोन) लग्न में हो तो अन्य मात्रा (अ, इ और उ) होती है।
लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानस्थित नवांशों के द्वारा नामाक्षरों का संग्रह होता है तथा पाप ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो तो अथवा पाप ग्रह की दृष्टि से भी अक्षर का नाश होता है।
अत्यन्त वीर्यशाली शुभ ग्रह जिस राशि के जितने संख्यक नवांश पर स्थित हो, तत्तुल्य अक्षरों को देता है। वही अत्यन्त बल अली शुभ ग्रह केन्द्र, त्रिकोण, अपने उच्च या अपने नवांश में स्थित होकर देखा जाता हो तो दो अक्षर देता है।
लग्न का स्वामी और नवांश बलहीन हो तो उस उत्पन्न मात्राक्षर का नाश होता है। यदि वही लग्नस्वामी और नवांश असम्भव (बलहीन का असम्भव अर्थात् बली) हो और उच्चस्थित नवांशस्वामी से देखा जाता हो तो मात्राक्षर की उत्पत्ति होती है।
केन्द्र में तथा राशि और राशिपति का स्थान और बल की उत्कृष्टता को जान कर अक्षरों का आनुपूर्विक संयोग करना चाहिये। साथ ही मात्रा आदि के संयोग की भी कल्पना करनी चाहिये।
वहाँ प्रथम लग्नराशि, फिर उससे चतुर्थ राशि आदि के प्रथम नवांश आदि क्रम से नवांशाधिपति ग्रहों के अपने-अपने वर्गाक्षरों के संयोजन में यह निष्पत्ति करनी चाहिये। अग्रिम पद्य से इसका अर्थ स्पष्ट होता है।
जैसे कि लग्न में मेष राशि और प्रथम नवांश हो तो उससे चतुर्थ-चतुर्थ क्रम से मेष, कर्क, तुला और मकर राशियाँ हुई। मेष में प्रथम नवांश का स्वामी मंगल होता है। उसके वर्ग का प्रथम अक्षर ककति आता है। चतुर्थ राशि (कर्क) का प्रथम नवांश स्वामी चन्द्र है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर यकार आता है। सप्तम राशि (तुला) का स्वामी शुक्र है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर चकार आता है और दशम राशि (मकर) का स्वामी शनि है, उसके वर्ग का प्रथम अक्षर पकार आता है। यदि मेष राशि के लग में द्वितीय नवांश हो तो मेष राशि में द्वितीय नवांश-स्वामी शुक्र के वर्ग का द्वितीय अक्षा छकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में द्वितीय नवांश-स्वामी सूर्य के वर्ग का प्रथम अक्षर अकार, सप्तम राशि तुला में द्वितीय-नवांश स्वामी मंगल के वर्ग का द्वितीय अक्षर खकार और दशम राशि (मकर) में द्वितीय नवांश-स्वामी शनि के वर्ग का द्वितीय अक्षर फकार आता है।
यदि मेष लग्न में तृतीय नांश हो तो मेष राशि में तृतीय नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में तृतीय नवांशाधिपति बुध के वर्ग का द्वितीय अक्षर ठकार, सप्तम राशि (तुला) में तृतीय नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का प्रथम अक्षर तकार और दशम राशि (मकर) में तृतीय नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का द्वितीय अक्षर थकार आता है। मेष राशि के लग्न में चतुर्थ नवांश हो तो मेष राशि में चतुर्थ नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का द्वितीय अक्षर रकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में चतुर्थ नर्वाशाधिपति शुक्र के वर्ग का तृतीय अक्षर जकार, सप्तम राशि (तुला) में 'चतुर्थ नवांशाधिपति शनि के वर्ग का तृतीय अक्षर वकार, दशम राशि (मकर) में चतुर्थ नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का तृतीय अक्षर गकार आता है।
मेष लग्न में पञ्चम नवांश हो तो मेष में पञ्चम नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का द्वितीय अक्षर आकार, चतुर्य राशि (कर्क) में पञ्चम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का चतुर्थ अक्षर घकार, सप्तम राशि (तुला) में पञ्चम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का चतुर्थ अक्षर मकार और दशम राशि (मकर) में पञ्चम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का चतुर्थ अक्षर झकार आता है। मेष लग्न में षष्ठ नवांश हो तो मेष में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का तृतीय अक्षर डकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार, सप्तम राशि (तुला) में षष्ठ नवांशाधिपति के वर्ग का चतुर्थ अक्षर धकार और दशम राशि (मकर) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का चतुर्थ अक्षर ढकार आता है।
मेष लान में सप्तम नवांश हो तो मेष में सप्तम नकाशाधिपति शुक्र के वर्ग का पश्चम अक्षर नकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में सप्तम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का पश्चम अक्षर मकार, सप्तम राशि (तुला) में सप्तम नवांशाधिपते मंगल के वर्ग का पश्चम अक्षर डकार और दशम राशि (मकार) में सप्तम वासाधिपति चन्द्र के क का तृतीय अक्षर लकार आता है। मेष लग्न में अष्टम नवांश हो तो भेष में अहम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का प्रथम अक्षर ककार, चतुर्थांश (क) में अন্ত্রন नवांशाधिपति शनि के वर्ग का प्रथम अक्षर पकार, सप्तम राशि (तुला) में अह नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का प्रथम अक्षर चकार और दशम राशि (मकर) में अक्षय नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का तृतीय अक्षर इकार आता है।
मेष लग्न में नवम नवांश हो तो मेष में नवम नांशाधिपति गुरु के वर्ग का पञ्चम अक्षर नकार, चतुर्थ राशि (कर्क) में नवम नवांशाधिपति गुरु के वर्ग का प्रथम अक्षर तकार, सप्तम राशि (तुला) में नवम नवांशाधिपति बुध के वर्ग का पञ्चम अक्षर णकार और दशम राशि (मकर) में नवम नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार आता है। यह चरसंज्ञक चार राशियों के लिये कहा गया है। अब स्थिरसंज्ञक चार राशियों के लिये कहता हूँ।
वृष लग्न में प्रथम नवांश हो तो वृष में प्रथम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का द्वितीय अक्षर फकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में प्रथम नवांशाधिपति मङ्गल के वर्ग का द्वितीय अक्षर खकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में प्रथम नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का
वृष लग्न में द्वितीय नवांश हो तो वृष में द्वितीय नवांशाधिपति शनि के वर्ग का तृतीय अक्षर वकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में द्वितीय नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का तृतीय अक्षर जकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में द्वितीय नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का चतुर्थ अक्षर ईकार और दशम राशि (कुम्भ) में द्वितीय नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का तृतीय अक्षर गकार आता है। वृष लग्न में तृतीय नवांश हो तो वृष में तृतीय नवांशा- धिपति गुरु के वर्ग का द्वितीय अक्षर धकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में तृतीय नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में तृतीय नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर डकार और दशम राशि (कुम्भ) में तृतीय नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार आता है।
वृष लग्न में चतुर्थ नवांश हो तो वृष में चतुर्थ नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का चतुर्थ अक्षर घकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में चतुर्थ नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का पञ्चम अक्षर शकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में चतुर्थ नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का चतुर्थ अक्षर झकार और दशम राशि (कुम्भ) में पश्चम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का चतुर्थ अक्षर भकार आता है। वृष लग्न में पश्चम नवांश हो तो वृष में पञ्चम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का पञ्चम अक्षर जकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में पञ्चम नवांशाधिपत्ति सूर्य के वर्ग का पञ्चम अक्षर उकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में पञ्चम नवांशाधिपति मङ्गल के वर्ग का पञ्चम अक्षर ङकार और दशम राशि (कुम्भ) में पञ्चम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का पञ्चम अक्षर मकार आता है।
वृष लग्न में षष्ठ नवांश हो तो वृष में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का चतुर्थ अक्षर ढकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का पश्चम अक्षर णकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का चतुर्थ अक्षर धकार और दशम राशि (कुम्भ) में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का पञ्चम बृ० २० द्वि०-३३ अक्षर नकार आता है। पृष लग्न में सप्तम नवांश हो तो वृष में सप्तम नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का षष्ठ अक्षर षकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में सप्तम नांशाधिपति शुक्र के वर्ग का प्रथम अक्षर चकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में सप्तम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का प्रथम अक्षर पकार और दशम राति (कुम्भ) में सप्तम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का प्रथम अक्षर ककार आता है।
वृष लग्न में अष्टम नवांश हो तो वृष में अष्टम नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का पष्ठ अक्षर ऊकार, चतुर्थ राशि (सिंह) में अष्टम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का द्वितीय अक्षर खकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में अष्टम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का द्वितीय अक्षर फकार और दशम राशि (कुम्भ) में अष्टम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का द्वितीय अक्षर छकार आता है। वृष लग्न में नवम नवांश हो तो वृष में नवम नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार, सप्तम राशि (वृश्चिक) में नवम नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का द्वितीय अक्षर बकार और दशम राशि (कुम्भ) में नवम नर्वासाधिपति बुध के वर्ग का द्वितीय अक्षर ठकार आता है।
द्विस्वभाव राशि मिथुन लग्न में प्रथम नवांश हो तो मिथुन में प्रथम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का तृतीय अक्षर जकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में प्रथम नांशाधिपति शनि के वर्ग का तृतीय अक्षर बकार, सप्तम राशि (धनु) में प्रथम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का तृतीय अक्षर गकार और दशम राशि (मोन) में प्रथम नवांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का सप्तम अक्षर सकार आता है।
मिथुन लग्न में द्वितीय नवांश हो तो मिथुन में द्वितीय नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का चतुर्य अक्षर घकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में द्वितीय नवांशाधिपति शनि के वर्ग का चतुर्थ अक्षर भकार, सप्तम राशि (धनु) में द्वितीय नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का चतुर्थ अक्षर झकार और दशम राशि (मीन) में द्वितीय नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का चतुर्थ अक्षर ईकार आता है। मिथुन लग्न में तृतीय नवांश हो तो मिथुन में तृतीय नांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में तृतीय
मिथुन लग्न में चतुर्थ नवांश हो तो मिथुन में चतुर्थ नवांशाधिपति शनि के वर्ग का पश्चम अक्षर मकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में चतुर्थ नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का पश्चम अक्षर ङकार, सप्तम राशि (धनु) में चतुर्थ नांशाधिपति चन्द्र के वर्ग का अष्टम अक्षर हकार और दशम राशि (मीन) में चतुर्थ नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का पञ्चम अक्षर जकार आता है। मिथुन लग्न में पञ्चम नांश हो तो मिधुन में पश्चम नवांशाधिपति शनि के वर्ग का प्रथम अक्षर पकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में पश्चम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का प्रथम अक्षर चकार, सप्तम राशि (धनु) में पञ्चम नवांशाधिपति सूर्य के वर्ग का अष्टम अक्षर ऐकार और दशम राशि (मीन) में पञ्चम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का प्रथम अक्षर ककार आता है।
मिथुन लग्न में षष्ठ नवांश हो तो मिथुन में षष्ठ नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का पञ्श्चम अक्षर नकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में षष्ठ नर्वाशाधिपति बुध के वर्ग का पञ्चम अक्षर णकार, सप्तम राशि (धनु) में षष्ठ नवांशाधिपति बुध के वर्ग का प्रथम अक्षर टकार और दमश राशि (मोन) में षष्ठ नवांशाधिपति के वर्ग का प्रथम अक्षर तकार आता है। मिथुन लग्न में सप्तम नवांश हो तो मिधुन में सप्तम नांशाधिपति मंगल के वर्ग का द्वितीय अक्षर खकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में सप्तम नवांशाधिपति शुक्र के वर्ग का द्वितीय अक्षर छकार और दशम राशि (मीन) में सप्तम नांशाधिपति शनि के वर्ग का द्वितीय अक्षर फकार आता है।
मिथुन लग्न में अष्टम नांश हो तो मिथुन में अष्टम नर्वाशाधिपति शुक्र के वर्ग का तृतीय अक्षर जकार, चतुर्य राशि (कन्या) में अष्टम नर्वासाधिपति सूर्य के वर्ग का नवम अक्षर ओकार, सप्तम राशि (पत्र) में अष्टम नवांशाधिपति मंगल के वर्ग का तृतीय अक्षर गकार और दशम राशि (मीन) में अष्टम नांशाधिपति शनि के वर्ग का तृतीय अक्षर बकार आता है। मिथुन लग्न में नवम नवांश हो तो मिथुन में नवम नर्वाशाधिपति बुध के वर्ग का द्वितीय अक्षर ठकार, चतुर्थ राशि (कन्या) में नवम नवांशाधिपति बुध के वर्ग का तृतीय अक्षर डकार, सप्तम राशि (धनु) में नवम नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का द्वितीय अक्षर थकार और दशम राशि (मीन) में नवम नवांशाधिपति बृहस्पति के वर्ग का तृतीय अक्षर दकार आता है।
इस तरह यह नामाक्षरों के संग्रहों की निर्विशेष विधि कही गई है। कोई-कोई आचार्य मेष आदि सभी लग्नों में पूर्वोक्त विधि को करने के लिये कहते हैं।
केन्द्रगत मेषादि राशि के नवांशसंख्या से केन्द्रगत राशि के अक्षरों को गुणा करके नव का भाग देने से जो शेष बचे तत्तुल्य नवांशाधिपति क्रम से अक्षर जानना चाहिये। यहाँ पर आचार्य के कहने का अभिप्राय यह है कि चर आदि तीनों केन्द्रों में मंगल आदि पाँच ग्रहों के छः-छः नवांश होते हैं तथा नव नवांश में नव अक्षर होते हैं; अतः यहाँ पर 'नव नवांश में नव अक्षर तो छः नवांश में क्या' इस त्रैराशिक से छ: अक्षर आते हैं। अतः चर राशि के प्रथम नवांश में अपने वर्ग का प्रथम अक्षर, द्वितीय में द्वितीय, तृतीय
सञ्चिन्तित ( मन से चिन्तित) कार्यों की परिकल्पना, पार्थित (वाणी से युक्त), निर्गत (निर्गमन), नष्ट वस्तु, क्षत, स्त्री, रति (स्त्री के साथ रमण), भोजन (आहारविशेष मांस आदि), स्वप्न, नक्षत्र, चिन्ता और पुरुष आदियों के नामों को जानना चाहिये। यहाँ पर चारो केन्द्रों को प्रस्तुत होने के कारण लग्न आदि क्रम से सञ्चिन्तित आदि के नामों को जानना चाहिये। जैसे-लग्न से सञ्चिन्तित, चतुर्थ से प्रार्थित, सप्तम से निर्गत, दशम से नष्ट वस्तु; फिर लग्न से क्षत, चतुर्थ से खो, सप्तम से रति, दशम से भोजन; फिर लग्न से स्वप्न, चतुर्थ से नक्षत्र, सप्तम से चिन्ता और दशम से पुरुषादि के नामों को जानना चाहिये। यहाँ तक यवनेश्वरकृत अक्षरकोश है।
चर लग्न और चर नवांश में आगन्तुक या प्रश्नकर्ता के दो अक्षर का नाम तथा स्थिर लग्न और स्थिर नवांश में चार अक्षर का नाम होता है। द्विस्वभाव राशि के लग्न और नवांश में दो नाम होते हैं; उनमें एक तीन अक्षर का और दूसरा पाँच अक्षर का होता है।
मंगल शुक्र, बुध, बृहस्पति और शनि के क्रम से कवर्ग आदि हैं। जैसे- मंगल के कवर्ग, शुक्र के चवर्ग, बुध के टवर्ग, बृहस्पति के तवर्ग और शनि के पवर्ग हैं
शनि के पवर्ग हैं तथा चन्द्र के यकार आदि आठ वर्ण (य, र, ल, व, श, ष, स, ह) और रवि के अकार आदि बारह स्वर (अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अ:) हैं।
नामाक्षर देने वाले ग्रहों में चन्द्र बली हो तो स्तनपान करने वाला बच्चा, मंगल हो तो बाल्य ( दो वर्ष से छः वर्ष तक का शिशु), बुध हो तो ब्रह्मचारी, शुक्र हो तो युवा, गुरु हो तो मध्यवयस्क, सूर्य हो तो वृद्ध और शनि हो तो अतिवृद्ध होता है।।१७।। इति 'विमला' हिन्दीटीकायां शाकुनोत्तराध्यायः षण्णवतितमः ॥
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें