केन्द्रे यथास्थानबलप्रकर्ष क्षेत्रस्य तत्क्षेत्रपतेच बुद्ध्वा ।
कायोंऽक्षराणामनुपूर्वयोगो मात्रादिसंयोगविकल्पना च ॥
केन्द्र में तथा राशि और राशिपति का स्थान और बल की उत्कृष्टता को जान कर अक्षरों का आनुपूर्विक संयोग करना चाहिये। साथ ही मात्रा आदि के संयोग की भी कल्पना करनी चाहिये।
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