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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 44
केन्द्राणि वा केन्द्रगतांशकैः स्वैः पृथक्पृथक् सङ्गुणितानि कृत्वा । त्रिकृद्विभक्तं विदुरक्षरं तत् क्षेत्रेश्वरस्यांशपरिक्रमस्वम् ।।
केन्द्रगत मेषादि राशि के नवांशसंख्या से केन्द्रगत राशि के अक्षरों को गुणा करके नव का भाग देने से जो शेष बचे तत्तुल्य नवांशाधिपति क्रम से अक्षर जानना चाहिये। यहाँ पर आचार्य के कहने का अभिप्राय यह है कि चर आदि तीनों केन्द्रों में मंगल आदि पाँच ग्रहों के छः-छः नवांश होते हैं तथा नव नवांश में नव अक्षर होते हैं; अतः यहाँ पर 'नव नवांश में नव अक्षर तो छः नवांश में क्या' इस त्रैराशिक से छ: अक्षर आते हैं। अतः चर राशि के प्रथम नवांश में अपने वर्ग का प्रथम अक्षर, द्वितीय में द्वितीय, तृतीय
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