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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 7
ग्राम्यः प्रदीप्तः स्वरचेष्टिताभ्यामुत्रो रुवन् कण्टकिनि स्थितश्च । भौमर्क्षलग्ने यदि नैर्ऋती च स्थितोऽभितश्चेत् कलहाय दृष्टः ॥
ग्राम्य, शकुन स्वर और चेष्टा से प्रदीप्त हो, बहुत जोर से शब्द करता हो, काँटेदार वृक्ष पर स्थित हो, मंगल की राशि (सेप और वृश्चिक लग्न में हो, नैऋत्य कोण में ३० ५० दि०-३२ स्थित हो और सम्मुख, वाम या दक्षिण पार्श्व में दिखाई दे तो कलह करता है।
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