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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 25
क्षेत्रेश्वरे क्षीणबलेंऽशके च मात्राक्षरं नाशमुपैति तज्जम् असम्भवेऽप्युद्भवमेति तस्मिन् वर्गाद्यमुच्चांशयुजीशदृष्टे ॥
लग्न का स्वामी और नवांश बलहीन हो तो उस उत्पन्न मात्राक्षर का नाश होता है। यदि वही लग्नस्वामी और नवांश असम्भव (बलहीन का असम्भव अर्थात् बली) हो और उच्चस्थित नवांशस्वामी से देखा जाता हो तो मात्राक्षर की उत्पत्ति होती है।
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