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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 19
द्विमूर्तिसंज्ञे तु वदेद् द्विनाम सौम्येक्षिते द्विप्रकृतौ च राशौ। यावान् गणः स्वोदयगोंऽशकानां तावान् ग्रहः संग्रहकेऽक्षराणाम् ॥
द्विस्वभाव राशि या सौम्य (बुध) से दृष्ट् द्विस्वभाव राशि में दो नाम कहना चाहिये तथा लग्नराशि में जितने नवांशों की संख्या व्यतीत हो गई हो, उतनी नामाक्षरों की संख्या कहनी चाहिये।
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