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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 27
तत्रादिराश्यादिचतुर्विलग्नमाद्यंशकादिक्रमपर्ययेण ग्रहांशकेभ्यः स्वगणाक्षराणामन्वर्थने प्राप्तिरियं विधार्या ।
वहाँ प्रथम लग्नराशि, फिर उससे चतुर्थ राशि आदि के प्रथम नवांश आदि क्रम से नवांशाधिपति ग्रहों के अपने-अपने वर्गाक्षरों के संयोजन में यह निष्पत्ति करनी चाहिये। अग्रिम पद्य से इसका अर्थ स्पष्ट होता है।
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