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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 3
उद्बद्धसंग्रहणभोजनचौरवह्नि- वर्षोत्सवात्मजवधाः कलहो भयं वर्गः च। स्थिरोऽयमुदयेन्दुयुते स्थिर क्षै विद्यात् स्थिरं चरगृहे च चरं यदुक्तम् ॥
उद्बद्ध (वहीं पर स्थित), संग्रहण (किसी के साथ संयोग), भोजन, चोर, अग्नि, वर्षा, उत्सव, पुत्र, वध, कलह, भय-ये स्थिर वर्ग हैं। यदि ये वर्ग स्थिर स्थान में उत्पन्न स्थिर स्थानस्थित शकुन के द्वारा सूचित किये जाते हों तो चरसंज्ञक होते हैं। यदि ये वर्ग स्थिर हों और उदयकालिक लग्न और चन्द्र स्थिर राशि में हो तो उद्वद्धादि कार्य उसी दिन या भूत में जानना चाहिये और चन्द्र चर राशि में हो और चर स्थानस्थित शकुन हों तो उद्वद्धादि कार्य भविष्य में जानना चाहिये।
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