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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 6
आग्नेयदिग्लग्नमुहूर्त्तदेशेष्वर्कप्रदीप्तोऽग्निभयाय रौति । विष्टयां यमक्षोंदयकण्टकेषु निष्पत्रवल्लीषु च दोषकृत् स्यात् ।।
आग्नेय (पूर्व और दक्षिण) दिशा, आग्नेय (क्रूर मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ) लग्न, अग्नि नामक मुहूर्त, आग्नेय (कृत्तिका) नक्षत्र, आग्नेय देश (अग्नि वाला स्थान) - इन स्थानों में सूर्य से प्रदीप्त होकर शकुन शब्द करें तो अग्निभय होते हैं तथा विष्टि करण, शनि की राशि (मकर और कुम्भ) लग्न में हो और काँटेदार वृक्ष या पत्ररहित लता पर स्थित सूर्य से दोप्त शकुन बैठा हो तो दोष करने वाला होता है।
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