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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 12
काणेनाक्ष्णा दक्षिणेनैति सूर्ये चन्द्रे लग्नाद् द्वादशे चेतरैण। लग्नस्थेऽर्के पापदृष्टेऽन्य एव कुब्मः स्वर्धे श्रोत्रहीनो जडो वा ॥
यदि लग्न से बारहवें स्थान में सूर्य हो तो दाहिनी आँख से काना, चन्द्र हो तो बाई आँख से काना, लग्नस्थित सूर्य पापग्रह (सूर्य, मंगल और शनि) से देखा जाता हो तो अन्धा, सिंह लग्न में स्थित सूर्य हो तो कुबड़ा, बहरा और मूर्ख तथा जिस राशि के लग्न से पापग्रह ( सूर्य, मंगल और शनि)
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