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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 17
द्रेष्काणवृद्ध्या प्रवदन्ति नाम त्रिपञ्चसप्ताक्षरमोजराशी । युग्मे तु विन्द्याद् द्विचतुष्कषट्कं नामाक्षराणि ग्रहदृष्टिवृद्धया ।।
द्रेष्काण को वृद्धि से नाम कहते हैं; जैसे-विषम राशि के प्रथम द्रेष्काण में तीन अक्षरों का, द्वितीय द्रेष्काण में पाँच अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में सात अक्षरों का नाम जानना चाहिये। साथ ही सम राशि के प्रथम द्रेष्काण में दो अक्षरों का, द्वितीय द्रेष्काण में चार अक्षरों का और तृतीय द्रेष्काण में छः अक्षरों का नाम जानना चाहिये। ग्रहदृष्टि की वृद्धि से नामाक्षर होते हैं। यहाँ पर दो प्रकार से नामाक्षर लाते हैं, प्रथम- स्थितिवश और द्वितीय- दृष्टिवश। दष्टिवश नामाक्षर लाने में दृष्टिवल का विचार क
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