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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 21
मात्रादियुक् स्याद् ग्रहयुक्त्रिकोणे द्रेष्काणपर्यायवदक्षरेषु । नभोबलेषूर्ध्वमधोऽम्बुजेषु ज्ञेयो विसगोंऽस्तबलान्वितेषु ॥
लग्न से पश्चम या नवम स्थान ग्रहों (सूर्यादि) से युत हो तो नाम के आदि का अक्षर मात्रायुक्त होता है तथा द्रेष्काण के पर्यायतुल्य अक्षर मात्रा से युक्त होता है। यथा-सम राशि का देष्काण हो तो सम अक्षर मात्रायुक्त होता है। जैसे- ईश्वर आदि। विषम राशि का द्रेष्काण हो तो विषम अक्षर मात्रायुक्त होता है, जैसे- श्रीधर आदि। यदि लग्न से दशम स्थान बली हो तो ऊर्ध्व मात्रा से युक्त नाम के आदि का अक्षर श्रीधर, वासुदेव, वैश्रवण, शौण्ड आदि एवं चतुर्थ स्थान बली हो तो अधोमात्रायुत नाम के आदि का अक्षर (सुहिरण्य, शूरवर्मा आदि) और सप्तम स्थान बली हो तो विसर्गयुत नाम के आदि का अक्षर होता है।
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