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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 20
संयोगमादौ बहुलेषु विन्द्यात् कूटेषु संयोगपरं बदन्ति । स्वोच्चांशके द्विष्कृतमृक्षयोगाद् गुर्वक्षरं तद्भवनांशके स्यात् ॥
बहुल (विषम राशियों) में नाम के आदि को संयुक्ताक्षर जानना चाहिये। जैसे- श्रीधर, क्षीर, स्मर आदि। कूट (सम राशियों में नाम के अन्त में संयुक्ताक्षर कहते हैं। जैसे-पद्म, धर्म, वत्स आदि। अपने उच्चांश में राशि के योग से एक अक्षर दो बार आता है। यथा-विषम राशि में अपना उच्चांश हो तो प्रथम आदि विषम अक्षर दो बार आता है। जैसे-दरद, दामोदर आदि। यदि सम राशि में अपना उच्चांश हो तो द्वितीय आदि सम अक्षर दो बार आता है, जैसे- देवदत्त, धराधर आदि। लग्नस्थित नवांश राशि में गुरु अक्षर होता है। जैसे- लग्नस्थित नवांश विषम राशि में हो तो नाम का विषम
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