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बृहत्संहिता • अध्याय 96 • श्लोक 45
सञ्चिन्तितप्रार्थितनिर्गतेषु नष्टक्षतस्त्रीरतिभोजनेषु । स्वप्नक्षचिन्तापुरुषादिवर्गेष्वेतेषु नामान्युपलक्षयेत ॥
सञ्चिन्तित ( मन से चिन्तित) कार्यों की परिकल्पना, पार्थित (वाणी से युक्त), निर्गत (निर्गमन), नष्ट वस्तु, क्षत, स्त्री, रति (स्त्री के साथ रमण), भोजन (आहारविशेष मांस आदि), स्वप्न, नक्षत्र, चिन्ता और पुरुष आदियों के नामों को जानना चाहिये। यहाँ पर चारो केन्द्रों को प्रस्तुत होने के कारण लग्न आदि क्रम से सञ्चिन्तित आदि के नामों को जानना चाहिये। जैसे-लग्न से सञ्चिन्तित, चतुर्थ से प्रार्थित, सप्तम से निर्गत, दशम से नष्ट वस्तु; फिर लग्न से क्षत, चतुर्थ से खो, सप्तम से रति, दशम से भोजन; फिर लग्न से स्वप्न, चतुर्थ से नक्षत्र, सप्तम से चिन्ता और दशम से पुरुषादि के नामों को जानना चाहिये। यहाँ तक यवनेश्वरकृत अक्षरकोश है।
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