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अध्याय 1 — पिंगलागीता

पिंगलागीता
63 श्लोक • केवल अनुवाद
राजा युधिष्ठिर ने कहा - हे पितामह! आपने राजधर्मसम्बन्धी श्रेष्ठ धर्मो का उपदेश दिया। हे पृथ्वीनाथ! अब आप आश्रमियों के उत्तम धर्म का वर्णन कीजिये।
भीष्मजी बोले - युधिष्ठिर! वेदों में सर्वत्र सभी आश्रमों के लिये स्वर्गसाधक यथार्थ फल की प्राप्ति कराने वाली तपस्या का उल्लेख है। धर्म के बहुत-से द्वार हैं। संसार में कोई ऐसी क्रिया नहीं है, जिसका कोई फल न हो।
भरतश्रेष्ठ! जो-जो पुरुष जिस-जिस विषयों में पूर्ण निश्चय को पहुँच जाता है (जिसके द्वारा उसे अभीष्ट सिद्धि का विश्वास हो जाता है), उसी को वह कर्तव्य समझता है। दूसरे विषय को नहीं।
मनुष्य जैसे-जैसे संसार के पदार्थों को सारहीन समझता है, वैसे-ही-वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है।
युधिष्ठिर! इस प्रकार यह जगत् अनेक दोषों से परिपूर्ण है, ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष अपने मोक्ष के लिये प्रयत्न करे।
युधिष्ठिर ने पूछा - दादाजी! धन के नष्ट हो जाने पर अथवा स्त्री, पुत्र या पिता के मर जाने पर किस बुद्धि से मनुष्य अपने शोक का निवारण करे? यह मुझे बताइये।
भीष्मजी ने कहा - वत्स! जब धन नष्ट हो जाय अथवा स्त्री, पुत्र या पिता की मृत्यु हो जाय, तब 'ओह! संसार कैसा दुःखमय है' यह सोचकर मनुष्य शोक को दूर करने वाले शम-दम आदि साधनों का अनुष्ठान करे।
इस विषय में किसी हितैषी ब्राह्मण ने राजा सेनजित्‌ के पास आकर उन्हें जैसा उपदेश दिया था, उसी प्राचीन इतिहास को विज्ञ पुरुष दृष्टयन्त के रूप में प्रस्तुत किया करते हैं।
राजा सेनजित्के पुत्र की मृत्यु हो गयी थी। वे उसी के शोक की आग से जल रहे थे। उनका मन विषाद में डूबा हुआ था। उन शोकविह्वल नरेश को देखकर ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा-
राजन्! तुम मूढ़ मनुष्य की भाँति क्यों मोहित हो रहे हो? शोक के योग्य तो तुम स्वयं ही हो, फिर दूसरों के लिये क्यों शोक करते हो? अजी! एक दिन ऐसा आयेगा, जब कि दूसरे शोचनीय मनुष्य तुम्हारे लिये भी शोक करते हुए उसी गति को प्राप्त होंगे।
पृथ्वीनाथ! तुम, मैं और ये दूसरे लोग जो इस समय तुम्हारे पास बैठे हैं, सब वहीं जायेंगे, जहाँ से हम आये हैं।
सेनजित्ने पूछा - तपस्या के धनी ब्राह्मणदेव! आपके पास ऐसी कौन-सी बुद्धि, कौन-सा तप, कौन-सी समाधि, कैसा ज्ञान और कौन-सा शास्त्र है, जिसे पाकर आपको किसी प्रकार का विषाद नहीं है।
ब्राह्मण ने कहा - राजन्! देखो, इस संसार में उत्तम, मध्यम और अधम सभी प्राणी भिन्न-भिन्न कर्मों में आसक्त हो दुःख से ग्रस्त हो रहे हैं।
यह शरीर भी मेरा नहीं अथवा सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है। ये सब वस्तुएँ जैसे मेरी हैं, वैसे ही दूसरों की भी हैं। ऐसा सोचकर इनके लिये मेरे मन में कोई व्यथा नहीं होती। इस बुद्धि को पाकर न मुझे हर्ष होता है, न शोक।
जिस प्रकार समुद्र में बहते हुए दो काष्ठ कभी-कभी एक-दूसरे से मिल जाते हैं और मिलकर फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार इस लोक में प्राणियों का समागम होता है।
इसी तरह पुत्र, पौत्र, जाति-बान्धव और सम्बन्धी भी मिल जाते हैं। उनके प्रति कभी आसक्ति नहीं बढ़ानी चाहिये; क्योंकि एक दिन उनसे बिछोह होना निश्चित है।
तुम्हारा पुत्र किसी अज्ञात स्थिति से आया था और अब अज्ञात स्थिति में ही चला, गया है। न तो वह तुम्हें जानता था और न तुम उसे जानते थे; फिर तुम उसके कौन होकर किसलिये शोक करते हो?
संसार में विषयों की तृष्णा से जो व्याकुलता होती है, उसी का नाम दुःख है और उस दुःख का विनाश ही सुख है। उस सुख के बाद (पुनः कामनाजनित) दुःख होता है। इस प्रकार बारम्बार दुःख ही होता रहता है।
सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख आता है। मनुष्यों के सुख और दुःख चक्र की भाँति घूमते रहते हैं।
इस समय तुम सुख से दुःख में आ पड़े हो। अब फिर तुम्हें सुख की प्राप्ति होगी। यहाँ किसी भी प्राणी को न तो सदा सुख ही प्राप्त होता है और न सदा दुःख ही।
यह शरीर ही सुख का आधार है और यही दुःख का भी आधार है। देहाभिमानी पुरुष शरीर से जो-जो कर्म करता है, उसी के अनुसार वह सुख एवं दुःखरूप फल भोगता है।
यह जीवन स्वभावतः शरीर के साथ ही उत्पन्न होता है। दोनों साथ-साथ विविध रूपों में रहते हैं और साथ-ही-साथ नष्ट हो जाते हैं।
मनुष्य नाना प्रकार के स्नेह-बन्धनों में बँधे हुए हैं, अतः वे सदा विषयों की आसक्ति से घिरे रहते हैं; इसीलिये जैसे बालू द्वारा बनाये हुए पुल जल के वेग से बह जाते हैं, उसी प्रकार उन मनुष्यों की विषयकामना सफल नहीं होती; जिससे वे दुःख पाते रहते हैं।
तेलीलोग तेल के लिये जैसे तिलों को कोल्हू में पेरते हैं, उसी प्रकार स्नेह के कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशों द्वारा सृष्टिचक्र में पिस रहे हैं।
मनुष्य स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्ब के लिये चोरी आदि पापकर्मों का संग्रह करता है; किंतु इस लोक और परलोक में उसे अकेले ही उन समस्त कर्मों का क्लेशमय फल भोगना पड़ता है।
स्त्री, पुत्र और कुटुम्ब में आसक्त हुए सभी मनुष्य उसी प्रकार शोक के समुद्र में डूब जाते हैं, जैसे बूढ़े जंगली हाथी दलदल में फँसकर नष्ट हो जाते हैं।
प्रभो! यहाँ सब लोगों को पुत्र, धन, कुटुम्बी तथा सम्बन्धियों का नाश होने पर दावानल के समान दाह उत्पन्न करने वाला महान् दुःख प्राप्त होता है; परंतु सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु आदि यह सब कुछ प्रारब्ध के ही, अधीन है।
मनुष्य हितैषी सुहृदों से युक्त हो या न हो, वह शत्रु के साथ हो या मित्र के, बुद्धिमान् हो या बुद्धिहीन, दैव की अनुकूलता होने पर ही सुख पाता है।
अन्यथा न तो सुहृद् सुख देने में समर्थ हैं, न शत्रु दुःख देने में समर्थ हैं, न तो बुद्धि धन देने की शक्ति रखती है और न धन ही सुख देने में समर्थ होता है।
न तो बुद्धि धन की प्राप्ति में कारण है, न मूर्खता निर्धनता में, वास्तव में संसार चक्र की गति का वृत्तान्त कोई ज्ञानी पुरुष ही जान पाता है, दूसरा नहीं।
बुद्धिमान्, शूरवीर, मूढ़, डरपोक, गूँगा, विद्वान्, दुर्बल और बलवान् जो भी भाग्यवान् होगा - दैव जिसके अनुकूल होगा, उसे बिना यत्न के ही सुख प्राप्त होगा।
दूध देने वाली गौ बछड़े की है या उसे दुहने अथवा चराने वाले ग्वाले की है या रखने वाले मालिक की है अथवा उसे चुराकर ले जाने वाले चोर की है? वास्तव में जो उसका दूध पीता है, उसी की वह गाय है; ऐसा विद्वानों का निश्चय है।
इस संसार में जो अत्यन्त मूढ़ हैं और जो बुद्धि से परे पहुँच गये हैं, वे ही मनुष्य सुखी हैं। बीच के सभी लोग कष्ट भोगते हैं।
ज्ञानी पुरुष अन्तिम स्थितियों में रमण करते हैं, मध्यवर्ती स्थिति में नहीं। अन्तिम स्थिति की प्राप्ति सुखस्वरूप बतायी जाती है और उन दोनों के मध्य की स्थिति दुःखरूप कही गयी है।
किंतु जिन्हें ज्ञानजनित सुख प्राप्त है, जो द्वन्द्वों से अतीत हैं तथा जिनमें मत्सरता का भी अभाव है, उन्हें अर्थ और अनर्थ कभी पीड़ा नहीं देते हैं।
जो मूढ़ता को तो लाँघ चुके हैं, परंतु जिनको ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, वे सुख की परिस्थिति आने पर अत्यन्त हर्ष से फूल उठते हैं और दुःख की परिस्थिति में अतिशय सन्ताप का अनुभव करने लगते हैं।
मूर्ख मनुष्य स्वर्ग में देवताओं की भाँति सदा विषयसुख में मग्न रहते हैं; क्योंकि उनका चित्त विषयासक्ति के कीचड़ में लथपथ होकर मोहित हो जाता है।
आरम्भ में आलस्य सुख-सा जान पड़ता है, परंतु वह अन्त में दुःखदायी होता है और कार्यकौशल दुःख-सा लगता है, परंतु वह सुख का उत्पादक है। कार्यकुशल पुरुष में ही लक्ष्मीसहित ऐश्वर्य निवास करता है, आलसी में नहीं।
अतः बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय, जो-जो प्राप्त हो जाय, उसका हृदय से स्वागत करे, कभी हिम्मत न हारे।
शोक के हजारों स्थान हैं और भय के सैकड़ों स्थान् हैं; किंतु वे प्रतिदिन मूर्खों पर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वानों पर नहीं।
जो बुद्धिमान्, ऊहापोह में कुशल एवं शिक्षित बुद्धिवाला, अध्यात्मशास्त्र के श्रवण की इच्छा रखने वाला, किसी के दोष न देखने वाला, मन को वश में रखने वाला और जितेन्द्रिय है, उस मनुष्य को शोक कभी छू भी नहीं सकता।
विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह इसी विचार का आश्रय लेकर मन को काम, क्रोध आदि शत्रुओं से सुरक्षित रखते हुए उत्तम बर्ताव करे। जो उत्पत्ति और विनाश के तत्त्व को जानता है, उसे शोक छू नहीं सकता।
जिसके कारण शोक, ताप अथवा दुःख हो या जिसके कारण अधिक श्रम उठाना पड़े, वह दुःख का मूल कारण अपने शरीर का एक अंग भी हो तो उसे त्याग देना चाहिये।
मनुष्य जब किसी भी पदार्थ में ममत्व कर लेता है, तब वे ही सब उसके वैसे दुःख के कारण बन जाते हैं।
वह कामनाओं में से जिस-जिसका परित्याग कर देता है, वही उसके सुख की पूर्ति करने वाली हो जाती है। जो पुरुष कामनाओं का अनुसरण करता है, वह उन्हीं के पीछे नष्ट हो जाता है।
संसार में जो कुछ इस लोक के भोगों का सुख है और जो स्वर्ग का महान् सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षय से होने वाले सुख की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं।
मनुष्य बुद्धिमान् हो, मूर्ख हो अथवा शूरवीर हो, उसने पूर्वजन्म में जैसा शुभ या अशुभ कर्म किया है, उसका वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है।
इस प्रकार जीवों को प्रिय अप्रिय और सुख-दुःख की प्राप्ति बार-बार क्रम से होती ही रहती है, इसमें सन्देह नहीं है।
ऐसी बुद्धि का आश्रय लेकर कामनाओं के त्यागरूपी गुण से युक्त हुआ मनुष्य सुख से रहता है; इसलिये सब प्रकार के भोगों से विरक्त होकर उन्हें पीठ-पीछे कर दे अर्थात् उनसे विमुख हो जाय।
हृदय से उत्पन्न होने वाला यह काम हृदय में ही पुष्ट होता है, फिर यही मृत्यु का रूप धारण कर लेता है; क्योंकि (जब इसकी सिद्धि में कोई बाधा आती है, तब) विद्वानों द्वारा यही प्राणियों के शरीर के भीतर क्रोध के नाम से पुकारा जाता है।
कछुआ जैसे अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार यह जीव जब अपनी सब कामनाओं का संकोच कर देता है, तब यह अपने विशुद्ध अन्तःकरण में ही स्वयं प्रकाशस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है।
जब यह किसी से भय नहीं मानता और इससे भी किसी को भय नहीं होता तथा जब यह किसी वस्तु को न तो चाहता है और न उससे द्वेष ही करता है, तब परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
जब यह साधक सत्य और असत्य अर्थात् जगत्‌ के व्यक्त और अव्यक्त पदार्थों का, शोक और हर्ष का, भय और अभय का तथा प्रिय और अप्रिय आदि समस्त द्वन्द्वों का परित्याग कर देता है, तब उसका चित्त शान्त हो जाता है।
जब धैर्यसम्पन्न ज्ञानवान् पुरुष किसी भी प्राणी के प्रति मन, वाणी और क्रिया द्वारा पापपूर्ण बर्ताव नहीं करता, तब परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
खोटी बुद्धि वाले मनुष्यों के लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्य के जीर्ण (वृद्ध) हो जाने पर भी स्वयं कभी जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणों के साथ जाने वाला रोग बनकर रहती है, उस तृष्णा को जो त्याग देता है, उसी को सुख मिलता है।
राजन्! इस विषय में पिंगला की गायी हुई गाथाएँ सुनी जाती हैं, जिसके अनुसार चलकर संकटकाल में भी उसने सनातन धर्म को प्राप्त कर लिया था।
एक बार पिंगला वेश्या बहुत देर तक संकेत-स्थान पर बैठी रही, तब भी उसका प्रियतम उसके पास नहीं आया; इससे वह बड़े कष्ट में पड़ गयी तथापि शान्त रहकर इस प्रकार विचार करने लगी।
पिंगला बोली - मेरे सच्चे प्रियतम चिरकाल से मेरे निकट ही रहते हैं। मैं सदा से उनके साथ ही रहती आयी हूँ। वे कभी उन्मत्त नहीं होते; परंतु मैं ऐसी मतवाली हो गयी थी कि आज से पहले उन्हें पहचान ही न सकी।
जिसमें एक ही खम्भा और नौ दरवाजे हैं, उस शरीररूपी घर को आज से मैं दूसरों के लिये बन्द कर दूँगी। यहाँ आने वाले उस सच्चे प्रियतम को जानकर भी कौन नारी किसी हाड़-मांस के पुतले को अपना प्राणवल्लभ मानेगी?
अब मैं मोहनिद्रा से जग गयी हूँ और निरन्तर सजग हूँ - कामनाओं का भी त्याग कर चुकी हूँ। अतः वे नरकरूपी धूर्त मनुष्य काम का रूप धारण करके अब मुझे धोखा नहीं दे सकेंगे।
भाग्य से अथवा पूर्वकृत शुभ कर्मों के प्रभाव से कभी-कभी अनर्थ भी अर्थरूप हो जाता है, जिससे आज निराश होकर मैं उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हो गयी हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रही हूँ।
वास्तव में जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, वही सुख से सोता है। आशा का न होना ही परम सुख है। देखो, आशा को निराशा के रूप में परिणत करके पिंगला सुख की नींद सोने लगी।
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ब्राह्मण के कहे हुए इन पूर्वोक्त तथा अन्य युक्तियुक्त वचनों से राजा सेनजित्का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गये और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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