आत्मापि चायं न मम सर्वा वा पृथिवी मम।
यथा मम तथान्येषामिति चिन्त्य न मे व्यथा।
एतां बुद्धिमहं प्राप्य न प्रहृष्ये न च व्यथे ॥
यह शरीर भी मेरा नहीं अथवा सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है। ये सब वस्तुएँ जैसे मेरी हैं, वैसे ही दूसरों की भी हैं। ऐसा सोचकर इनके लिये मेरे मन में कोई व्यथा नहीं होती। इस बुद्धि को पाकर न मुझे हर्ष होता है, न शोक।
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