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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 38
सुखं दुःखान्तमालस्यं दुःखं दाक्ष्यं सुखोदयम् । भूतिस्त्वेवं श्रिया सार्धं दक्षे वसति नालसे ॥
आरम्भ में आलस्य सुख-सा जान पड़ता है, परंतु वह अन्त में दुःखदायी होता है और कार्यकौशल दुःख-सा लगता है, परंतु वह सुख का उत्पादक है। कार्यकुशल पुरुष में ही लक्ष्मीसहित ऐश्वर्य निवास करता है, आलसी में नहीं।
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