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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 41
बुद्धिमन्तं कृतप्रज्ञं शुश्रूषुमनसूयकम् । दान्तं जितेन्द्रियं चापि शोको न स्पृशते नरम् ॥
जो बुद्धिमान्, ऊहापोह में कुशल एवं शिक्षित बुद्धिवाला, अध्यात्मशास्त्र के श्रवण की इच्छा रखने वाला, किसी के दोष न देखने वाला, मन को वश में रखने वाला और जितेन्द्रिय है, उस मनुष्य को शोक कभी छू भी नहीं सकता।
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