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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 58
उन्मत्ताहमनुन्मत्तं कान्तमन्ववसं चिरम्‌। अन्तिकि रमणं सन्त नैनमध्यगमं पुरा॥
पिंगला बोली - मेरे सच्चे प्रियतम चिरकाल से मेरे निकट ही रहते हैं। मैं सदा से उनके साथ ही रहती आयी हूँ। वे कभी उन्मत्त नहीं होते; परंतु मैं ऐसी मतवाली हो गयी थी कि आज से पहले उन्हें पहचान ही न सकी।
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