सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा थदि वाप्रियम् ।
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥
अतः बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय, जो-जो प्राप्त हो जाय, उसका हृदय से स्वागत करे, कभी हिम्मत न हारे।
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