अकामां कामरूपेण धूर्ता नरकरूपिणः ।
न पुनर्वञ्चयिष्यन्ति प्रतिबुद्धास्मि जागृमि ॥
अब मैं मोहनिद्रा से जग गयी हूँ और निरन्तर सजग हूँ - कामनाओं का भी त्याग कर चुकी हूँ। अतः वे नरकरूपी धूर्त मनुष्य काम का रूप धारण करके अब मुझे धोखा नहीं दे सकेंगे।
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