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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 63
भीष्म उवाच एतैश्चान्यैश्च विप्रस्य हेतुमद्धिः प्रभाषितैः । पर्यवंस्थापितो राजा सेनजिन्मुमुदे सुखी ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पिङ्गलागीता सम्पूर्णा ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ब्राह्मण के कहे हुए इन पूर्वोक्त तथा अन्य युक्तियुक्त वचनों से राजा सेनजित्का चित्त स्थिर हो गया। वे शोक छोड़कर सुखी हो गये और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।
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