या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥
खोटी बुद्धि वाले मनुष्यों के लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो मनुष्य के जीर्ण (वृद्ध) हो जाने पर भी स्वयं कभी जीर्ण नहीं होती तथा जो प्राणों के साथ जाने वाला रोग बनकर रहती है, उस तृष्णा को जो त्याग देता है, उसी को सुख मिलता है।
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