अनर्थों हि भवेदर्थो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
सम्बुद्धाहं निराकारा नाहमद्याजितेन्द्रिया ॥
भाग्य से अथवा पूर्वकृत शुभ कर्मों के प्रभाव से कभी-कभी अनर्थ भी अर्थरूप हो जाता है, जिससे आज निराश होकर मैं उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हो गयी हूँ। अब मैं अजितेन्द्रिय नहीं रही हूँ।
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