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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
सञ्चिनोत्यशुभं कर्म कलत्रापेक्षया नरः । एकः क्लेशानवाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥
मनुष्य स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्ब के लिये चोरी आदि पापकर्मों का संग्रह करता है; किंतु इस लोक और परलोक में उसे अकेले ही उन समस्त कर्मों का क्लेशमय फल भोगना पड़ता है।
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