यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् ।
तथा तथा विरागोऽत्र जायते नात्र संशयः ॥
मनुष्य जैसे-जैसे संसार के पदार्थों को सारहीन समझता है, वैसे-ही-वैसे इनमें उसका वैराग्य होता जाता है, इसमें संशय नहीं है।
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