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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 28
असुहृत् ससुहृच्चापि सशत्रुर्मित्रवानपि । सप्रज्ञः प्रज्ञया हीनो दैवेन लभते सुखम् ॥
मनुष्य हितैषी सुहृदों से युक्त हो या न हो, वह शत्रु के साथ हो या मित्र के, बुद्धिमान् हो या बुद्धिहीन, दैव की अनुकूलता होने पर ही सुख पाता है।
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