ये च बुद्धिसुखं प्राप्ता द्वन्द्वातीता विमत्सराः ।
तान् नैवार्था न चानर्था व्यथयन्ति कदाचन ॥
किंतु जिन्हें ज्ञानजनित सुख प्राप्त है, जो द्वन्द्वों से अतीत हैं तथा जिनमें मत्सरता का भी अभाव है, उन्हें अर्थ और अनर्थ कभी पीड़ा नहीं देते हैं।
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