कछुआ जैसे अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार यह जीव जब अपनी सब कामनाओं का संकोच कर देता है, तब यह अपने विशुद्ध अन्तःकरण में ही स्वयं प्रकाशस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है।
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