न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति ।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
जब यह किसी से भय नहीं मानता और इससे भी किसी को भय नहीं होता तथा जब यह किसी वस्तु को न तो चाहता है और न उससे द्वेष ही करता है, तब परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
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