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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 44
किञ्चिदेव ममत्वेन यदा भवति कल्पितम्। तदेव परितापार्थं सर्वं सम्पद्यते तथा॥
मनुष्य जब किसी भी पदार्थ में ममत्व कर लेता है, तब वे ही सब उसके वैसे दुःख के कारण बन जाते हैं।
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