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पिंगलागीता • अध्याय 1 • श्लोक 59
एकस्थूणं नवद्वारमपिधास्याम्यगारकम् । का हि कान्तमिहायान्तमयं कान्तेति मंस्यते ॥
जिसमें एक ही खम्भा और नौ दरवाजे हैं, उस शरीररूपी घर को आज से मैं दूसरों के लिये बन्द कर दूँगी। यहाँ आने वाले उस सच्चे प्रियतम को जानकर भी कौन नारी किसी हाड़-मांस के पुतले को अपना प्राणवल्लभ मानेगी?
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