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अध्याय 5 — पाँचवाँ अध्याय
विदुर नीति
64 श्लोक • केवल अनुवाद
विदूर कहते हैं - रजेन्द्र! विचित्रवीर्यनन्दन! स्वायन्भुव मनुजी ने कहा है, कि नीचे लिखे सत्रह प्रकार के पुरुषों को पाश हाथ में लिये यमराज के दूत नरक में ले जाते हैं, जो आकाश पर मुष्टि प्रहर करता है।
न झुकाये जा सकने वाले, वर्षा कालीन इन्द्र थनुष को झुकाना चाहता है, पकड़ मे न आने वाली, सूर्य की किरणो को पकड़ने का प्रयास करता है।
शासन के अयोग्य पुरूष पर शासन करता है, मर्यादा का उल्लंघन करके संतुष्ट होता है, शत्रु की सवा करता है, रक्षण के अयोग्य स्त्री की रक्षा करने का प्रयत्न करता, तथा उसके द्वारा अपने कल्याण का अनुभव करता है, याचना करने के अयोग्य पुरुष से याचना करता है, तथा आत्मप्रशंसा करता है।
अच्छे कुल में उत्पन्न होकर भी, नीच कर्म करता है, दुर्बल होकर भी, बलवान से वैर बाँधता है, श्रद्धाहीन को उपदेश करता है, न चाहने योग्य (शास्त्रनिषिद्ध) वस्तु को चाहता है।
श्वशुर होकर, पुत्र वधू के साथ परिहास पसन्द करता है, तथा पुत्र वधु से एकान्तवास करके भी, निर्भय होकर समाज में अपनी प्रतिष्ठा चाहता है, पर स्त्री में अपने वीर्य का आधान करता है, आवश्यकता से अधिक स्त्री की निन्दा करता है।
किसी से कोई बस्तु पाकर भी याद नहीं है', ऐसा कहकर उसे दबाना चाहता है, माँगने पर, दान देकर उसके लिये अपनी डींग हाँकता है, और झुठ को सही साबित करने का प्रयास करता है।
जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ वैसा ही वर्ताव करना चाहिये, यही नीति-धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ, कपट पूर्ण बर्ताव करे, और अच्छा बर्ताव करने वाले के साथ, साधु - भाव से ही बर्ताव करना चाहिये।
बुढापा रूप का, आशा धैर्य का, मृत्यु प्राणों का, असूया धर्माचरण का, काम लज्जा का, नीच पुरुषों की सेवा सदाचार का, क्रोध लक्ष्मी का, और अभिमान सर्वस्व का ही नाश कर देता है।
धृतराष्ट्र ने कहा - जब सभी वेदों में, पुरुष को सो वर्ष की आयु वाला बताया गया है, तो वह किस कारण से अपनी पूर्ण आयु को नहीं पाता?
विदुर जी बोले - राजन्! आपका कल्याण हो। अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता, और मित्र द्रोह।
ये छः तीखी तलवारें, देह धारियों की आयु को काटती हैं। ये ही मनुष्यों का वध करती हैं, मत्यु नहीं।
भारत! जो अपने ऊपर विश्वास करने वाले की, स्त्री के साथ समागम करता है, जो गुरु स्त्री गामी है, ब्राह्मण होकर, शुद्र की स्त्री से सम्बन्ध रखता है, शराब पीता है, तथा, जो बड़ों पर हुकुम चलाने वाला, दूसरों की जीविका नष्टः करने वाला।
ब्राह्मण को सेवा कार्य के लिये इधर-उधर भेजने वाला, और शरणागत की हिंसा करने वाला है, ये सब के सब ब्रह्म हत्यारे के समान है, इनका सङ्ग ही जाने पर प्रायश्चित करे, यह वेदों की आज्ञा है।
बड़ो की आज्ञा मानने वाला नीतिज्ञ, दाता यज्ञ शेष अन्र का भोजन करने वाला, हिंसा रहित, अनर्थकारी कार्यो से दूर रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी और कोमल स्वभाव वाला विद्वान्, स्वर्ग-गामी होता है।
राजन्! सदा प्रिय वचन बोलने वाले मनुष्य, तो सहज में ही मिल सकते हैं, किंतु जो अप्रिय होता हुआ, हितकारी हो, ऐसे वचन के वक्ता, और श्रोता, दोनों ही दुर्लभ हैं।
जो धर्म का आश्रय लेकर, तथा स्वामी को प्रिय लगेगा, या अप्रिय, इसका विचार छोड़कर, अप्रिय होने पर भी हित की बात कहता है, उसी से राजा को सच्ची सहायता मिलती है।
कुल की रक्षा के लिये एक मनुष्य का, ग्राम की रक्षा के लिये कुल का, देश की रक्षा के लिये गाँव का, और आत्मा के कल्याण के लिये सारी पृथ्वी का, त्याग कर देना चाहिये ।
आपत्ति के लिये धन की रक्षा करे, धन के द्वारा भी स्त्री की रक्षा करे, और स्त्री एवं धन, दोनों के द्वारा सदा अपनी रक्षा करे।
पहले के समय में जुआ खेलना, मनुष्यों में वैर डालने का कारण देखा गया हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्य, हँसी के लिये भी जूआ न खेले।
प्रतीपनन्दनं! विचित्र वीर्य कुमार! राजन्! मेंने जूए का खेल आरम्भ होते समय भी कहा था, कि यह ठीक नहीं है, किन्तु रोगी को जैसे दवा और पथ्य नहीं भाते, उसी तरह मेरी वह बात भी आपको अच्छी नहीं लगी।
नरेन्द्र! आप कौओं के समान, अपने पुत्र के ह्वारा विचित्र पंख वाले मोरों के सदश, पाण्डवों को पराजित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, सिंहो को छोडकर सियारों की रक्षा कर रहे हैं, समय आने पर आप को इसके लिये पश्चाताप करना पड़ेगा।
तात! जो स्वामि सदा हित साधन मे लगे रहने वाले, अपने भक्त सेवक पर कभी क्रोध नहीं करता, उस पर भूत्यगण विश्वास करते हैं, और उसे आपत्ति के समय भी नहीं छोड़ते।
सेवकों की जीविका बन्द करके, दूसरों के राज्य और धन के अपहरण का प्रयत्न नहीं करना चाहिये, क्योंकि अपनी जीविका छिन जाने से, भोगों से वंचित होकर पहले के प्रेमी मन्त्री भी, उस समय विरोधी बन जाते हैं, और राजा का परित्याग कर देते हैं।
पहले कर्तव्य, आय-व्यय, और उचित वेतन, आदि का निश्चय करके, फिर सुर्योग्य सहायका का संग्रह करे। क्यांकि कठिन से कठिन कार्य भी सहायको द्वारा साध्य होते हैं।
जो सेवक स्वामी के अभिप्राय को समझकर, आलस्य रहित हो, समस्त कार्य को पूरा करता है, जो हित की बात कहने वाला, स्वामिभक्त, सज्जन और राजा की शक्ति की जानने वाला है, उसे अपने समान समझकर, कृपा करना चाहिये।
जो सेवक, स्वामी के आज्ञा देने पर, उनकी बात का आदर नहीं करता, किसी काम में लगाये जाने पर, इनकार कर जाता है, अपनी बुद्धि पर गर्व करने, और प्रतिकूल बोलने वाले, उस भूत्य को शीघ्र ही त्याग देना चाहिये।
अहंकार रहित, कायरता शून्य, शीष्र काम पूरा करने वाला, दयालु, शुद्ध हृदय, दूसरो के बहकावे में न आने वाला, नीरीग, और उदार बचन वाला, इन आठ गुणो से युक्त मनुष्य को, दूत बनाने योग्य बताया गया हैं।
सावधान मनुष्य विश्वास करके, असमय में कभी किसी दुसरे अविश्वस्त मनुष्य के घर न जाय, रात मे छिपकर चौराहे पर न खड़ा हो, और राजा जिस स्त्री को ग्रहण करना चाहता हो, उसे प्राप्त करने का यल्न न करें।
दुष्ट सहायको वाला राजा, जब बहुत लोगों के साथ मन्त्रणा समिति में बैठकर सलाह ले रहा हो, उस समय उसकी बात का खण्डन न करे। मैं तुम पर विश्वास नहीं करता ऐसा भी न कहे, अपितु, कोई युक्तिसंगत बहाना बना कर वहाँ से हट जाय।
अधिक दयालु राजा, व्यभिचारिणी स्त्री, राजकर्मचारी, पुत्र, भाई, छोटें बच्चों बाली विधवा, सैनिक, और जिसका अधिकार छीन लिया गया हो, वह इन सबके साथ लेन-देन का व्यवहार न करे।
ये आठ गुण परुष की शोभा बढ़ाते हैं, बुद्धि, लीनता, शास्त्र ज्ञान, इन्द्रिय निम्रह, पराक्रम, अधिक न बोलने का स्वभाव, यथाशक्ति दान, और कतज्ञता।
तात! एक गुण एसा है, जो इन सभी महत्वपुर्ण गुणो पर हठात् आधिकार कर लेता है। राजा जिस समय किसी मनुष्य का सत्कार करता है, उस समय यह गुण (राज सम्मान), उपर्युक्त सभी गुणों से बढ़कर शोभा पाता है।
नित्य स्नान करने वाले मनुष्य को बल, रूप, मधुर स्वर, उज्ज्वल वर्ण, कोमलता, सुगंन्ध, पवित्रता, शोभा, सुकुमारता, और सुन्दर स्त्रियाँ - ये दस लाभ प्राप्त होते हैं।
थोड़ा भोजन करने वाले को निम्नलिखित छः गुण प्राप्त होते हैं, आरोग्य, आयु, बल, और सुख तो मिलते ही हैं, उसकी संतान सुन्दर होती है, तथा यह बहुत खाने वाला है, ऐसा कहकर लोग उस पर आक्षेप नहीं करते।
अकर्मण्य, बहुत खाने वाले, सब लोगो से वेर करने वाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश-काल का ज्ञान न रखने वाले, और निन्दित वेष धारण करने वाले मनुष्य को, कभी अपने घर में न ठहरने दे।
बहुत दुखी होने पर भी कृपण, गाली बकने वाले, मूर्ख, जंगल में रहने वाले, धूर्त, नीच सेवी, निर्दयी, वैर बाँधने वाले, और कृतन्न से, कभी सहायता की याचना नहीं करनी चाहिये।
क्लेशप्रद कर्म करने वाला, अत्यन्त प्रमादी, सदा असत्य भाषण करने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित, अपने को चतुर मानने वाला, इन छः प्रकार के अधम पुरुषों की सेवा न करे।
धन की प्राप्ति, सहायक की अपेक्षा रखती है, और सहायक धन की अपेक्षा रखते हैं। ये दोनों एक-दूसरे के आश्रित हैं, परस्पर के सहयोग बिना इनकी सिद्धि नहीं होती।
पुत्रो को उत्पन्न कर, उन्हें ऋण के भार से मुक्त करके, उनके लिये किसी जीविका का प्रबन्ध कर दे, फिर कन्याओ का योग्य वर के साथ विवाह कर देने के पश्चात्, वन मे मुनिवृत्ति से रहने की इच्छा करे।
जो सम्पूर्ण प्रापियों के लिये हितकर, और अपने लिये भी सुखद हो, उसे ईश्वरार्पण बुद्धि से करे, सम्पूर्ण सिद्धियों का यही मूल मन्त्र है।
जिस में बढ़ने की হक्ति, प्रभाव, तेज, पराक्रम, उद्योग, और निश्चय है, उसे अपनी जीविका के नाश का भय कैसे हो सकता है।
पाण्डवं के साथ युद्ध करने में जो दोष हैं, उन पर दृष्टि डालिये, उनसे संग्राम छिड़ जाने पर, इन्द्र आदि देवताओं को भी कष्ट ही उठाना पड़ेगा। इसके सिवा, पुत्रो के साथ वैर, निल्प उद्वेगपूर्ण जीवन, कीर्ति का नाহা, और शत्रुओ को आनन्द होगा।
इन्द्र के समान पराक्रमी महाराज! आकाश मे तिरछा उदित हुआ धूमकेतु, जैसे सारे संसार में अशान्ति, और उपद्रव खड़ी कर देता है, उसी तरह भीष्म, आप, द्रोणाचार्य, और राजा युधिष्टिर का बढ़ा हुआ कोप, इस संसार का संहार कर सकता है।
आपके सौ पुत्र, कर्ण, और पाँच पाण्डव, ये सब मिल कर समुद्र पर्यन्त, सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन कर सकते हैं।
राजन्! आपके पुत्र वन के समान हैं, और पाण्डव उसमें रहने वाले व्याघ्र हैं। आप व्याघ्रों सहित समस्त वन को नष्ट न कीजिये, तथा बन से उन व्याघ्रो को दूर न भगाइये।
व्याघ्रों के बिना वन की रक्षा नहीं हो सकती, तथा वन के बिना व्याघ्र नहीं रह सकते। क्योंकि व्याघ्र वन की रक्षा करते हैं, और वन व्याघों की।
जिनका मन पाप में लगा रहता है, वे लोग दूसरो के कल्याणमय गुण को जानने की वेसी इच्छा नहीं रखते, जैसी कि उनके अवगुणों को जानने की रखते हैं।
जो अर्थ का पूर्ण सिद्धि चाहता हो, उसे पहले धर्म का ही आचरण करना चाहिये। जैसे स्वर्ग से अमृतत्व दूर नही होता, उसी प्रकार धर्म से अर्थ अलग नहीं होता।
जिसकी बुद्धि पाप से हटाकर कल्याण में लगा दी गयी है, उसने संसार में जो भी प्रकृति और विकृति हैं, उन सबको जान लिया है।
जो समयानुसार धर्म, अर्थ, और काम का सेवन करता है, वह इस लोक और परलोक में भी धर्म, अर्थ, और काम को प्राप्त करता है।
राजन्! जो क्रोध और हर्ष के उठे हुए वेग को रोक लेता है, और आपत्ति में भी धैर्य को खो नहीं बैठता, बही राजलक्ष्मी का अधिकारी होता है।
आपका कल्याण हो, मनुष्य में सदा पाँच प्रकार का बल होता है, उसे सुनिये। जो बहुबल नामक बल है, वह कनिष्ठ बल कहलाता है।
मंत्री को मिलना दूसरा बल हैं, मनीषी लोग धन के लाभ को तीसरा बल बताते हैं।
राजन्! जो बाप दादो से प्राप्त हुआ, मनुष्य का स्वाभाविक बल, (कुटम्ब का बल) है, वह अभिजात नामक चौथा बल है।
भारत! जिसमे इन सभी बलों का संगह हो जाता है, तब जो सब बलों में श्रेष्ठ बल है, वह पाँचवा, बुद्धि का बल कहलाता है।
जो मनुष्य का बहुत बड़ा अपकार कर सकता है, उस पुरुष के साथ बैर ठानकर, इस विश्वास पर निश्चिन्त न हो जाय कि मैं उससे दूर हूँ, (बह मेरा कुछ नहीं कर सकता)।
ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा, जो स्त्री, राजा, साँप, पढ़े हुए पाठ, सामर्थ्यशाली व्यक्ति, शत्रु भोग, और आयुष्य पर पूर्ण विश्वास कर सकता हो।
जिस को बुद्धि के बाण से मारा गया है, उस जीव के लिये न कोई वैध्य है, न दवा है, न होम है, न मन्त्र है, न कोई माङ्गलिक कार्य, न अरथववेदोक्त प्रयोग, और न भलीं-भाँति सिद्ध जड़ी-बूटी ही है।
भारत! मनुष्य को चाहिये, कि वह सर्प, अग्नि, सिंह, और अपने कुल में उत्पन्न व्यक्तिव का अनादर न करे, क्योंकि ये सभी बड़े तेजस्वी होते हैं।
महान संसार रूपी वनों में अग्नि और तेज छिपे हुए हैं। हम उस लकड़ी का उपयोग तब तक नहीं करते जब तक कि वह दूसरों के द्वारा जलाई न जाए।
वही अग्नि यदि, काष्ठ से मथकर उद्दीप्त कर दी जाती है, तो बह अपने तेज से, उस काष्ठ को, जंगल को, तथा दूसरी वस्तुओं को भी जल्दी ही जला डालती है।
इसी प्रकार अपने कुल में उत्पन्न, वे अग्रि के समान तेजस्वी पाण्डव, और विकार शून्य हो, काष्ठ में छिपी अग्रि की तरह शान्त भाव स्थित हैं।
अपने पुत्रो सहित आप, लता के समान है, और पाण्डव महान् शालबूक्ष सदृश हैं, महान् वृक्ष का आश्रय लिये बिना लता कभी बढ़ नहीं सकती है।
राजन्! अम्बिकानन्दन! आपके पुत्र एक वन हैं, और पाण्डवों को उस भीतर रहने वाले सिंह समझिये। तात! सिंह से सूना हो जाने पर वन नष्ट हो जाता है, और वन के बिना सिंह भी नष्ट हो जाते हैं।
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धर्म का अन्वेषण
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