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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 1
विदुर उवाच । सप्तदशेमान्राजेन्द्र मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् । वैचित्रवीर्य पुरुषानाकाशं मुष्टिभिर्घ्नतः ॥
विदूर कहते हैं - रजेन्द्र! विचित्रवीर्यनन्दन! स्वायन्भुव मनुजी ने कहा है, कि नीचे लिखे सत्रह प्रकार के पुरुषों को पाश हाथ में लिये यमराज के दूत नरक में ले जाते हैं, जो आकाश पर मुष्टि प्रहर करता है।
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