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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 42
पश्य दोषान्पाण्डवैर्विग्रहे त्वं यत्र व्यथेरन्नपि देवाः स शक्राः । पुत्रैर्वैरं नित्यमुद्विग्नवासो यशः प्रणाशो द्विषतां च हर्षः ॥
पाण्डवं के साथ युद्ध करने में जो दोष हैं, उन पर दृष्टि डालिये, उनसे संग्राम छिड़ जाने पर, इन्द्र आदि देवताओं को भी कष्ट ही उठाना पड़ेगा। इसके सिवा, पुत्रो के साथ वैर, निल्प उद्वेगपूर्ण जीवन, कीर्ति का नाহা, और शत्रुओ को आनन्द होगा।
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