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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 32
एतान् गुणांस्तात महानुभावा-नेको गुण: संश्रयते प्रसह्य । यदा सत्कुरुते मनुष्यं सर्वान् गुणानेष गुणो बिभर्ति ॥
तात! एक गुण एसा है, जो इन सभी महत्वपुर्ण गुणो पर हठात् आधिकार कर लेता है। राजा जिस समय किसी मनुष्य का सत्कार करता है, उस समय यह गुण (राज सम्मान), उपर्युक्त सभी गुणों से बढ़कर शोभा पाता है।
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