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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 14
गृही वदान्योऽनपविद्ध वाक्यः शेषान्न भोकाप्यविहिंसकश् च । नानर्थकृत्त्यक्तकलिः कृतज्ञः सत्यो मृदुः स्वर्गमुपैति विद्वान् ॥
बड़ो की आज्ञा मानने वाला नीतिज्ञ, दाता यज्ञ शेष अन्र का भोजन करने वाला, हिंसा रहित, अनर्थकारी कार्यो से दूर रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवादी और कोमल स्वभाव वाला विद्वान्, स्वर्ग-गामी होता है।
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