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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 10
विदुर उवाच । अतिवादोऽतिमानश्च तथात्यागो नराधिपः । क्रोधश्चातिविवित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥
विदुर जी बोले - राजन्! आपका कल्याण हो। अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता, और मित्र द्रोह।
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