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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 47
न तथेच्छन्त्यकल्याणाः परेषां वेदितुं गुणान् । यथैषां ज्ञातुमिच्छन्ति नैर्गुण्यं पापचेतसः ॥
जिनका मन पाप में लगा रहता है, वे लोग दूसरो के कल्याणमय गुण को जानने की वेसी इच्छा नहीं रखते, जैसी कि उनके अवगुणों को जानने की रखते हैं।
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