अर्थसिद्धिं परामिच्छन्धर्ममेवादितश् चरेत् ।
न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम् ॥
जो अर्थ का पूर्ण सिद्धि चाहता हो, उसे पहले धर्म का ही आचरण करना चाहिये। जैसे स्वर्ग से अमृतत्व दूर नही होता, उसी प्रकार धर्म से अर्थ अलग नहीं होता।
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