प्रतीपनन्दनं! विचित्र वीर्य कुमार! राजन्! मेंने जूए का खेल आरम्भ होते समय भी कहा था, कि यह ठीक नहीं है, किन्तु रोगी को जैसे दवा और पथ्य नहीं भाते, उसी तरह मेरी वह बात भी आपको अच्छी नहीं लगी।
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