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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 37
सङ्क्लिष्टकर्माणमतिप्रवादं नित्यानृतं चादृढ भक्तिकं च । विकृष्टरागं बहुमानिनं चाप्य् एतान्न सेवेत नराधमान्षट् ॥
क्लेशप्रद कर्म करने वाला, अत्यन्त प्रमादी, सदा असत्य भाषण करने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित, अपने को चतुर मानने वाला, इन छः प्रकार के अधम पुरुषों की सेवा न करे।
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