यो हि धर्मं व्यपाश्रित्य हित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये ।
अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥
जो धर्म का आश्रय लेकर, तथा स्वामी को प्रिय लगेगा, या अप्रिय, इसका विचार छोड़कर, अप्रिय होने पर भी हित की बात कहता है, उसी से राजा को सच्ची सहायता मिलती है।
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