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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 3
यश्चाशिष्यं शासति यश् च कुप्यते यश्चातिवेलं भजते द्विषन्तम् । स्त्रियश्च योऽरक्षति भद्रमस्तु ते यश्चायाच्यं याचति यश् च कत्थते ॥
शासन के अयोग्य पुरूष पर शासन करता है, मर्यादा का उल्लंघन करके संतुष्ट होता है, शत्रु की सवा करता है, रक्षण के अयोग्य स्त्री की रक्षा करने का प्रयत्न करता, तथा उसके द्वारा अपने कल्याण का अनुभव करता है, याचना करने के अयोग्य पुरुष से याचना करता है, तथा आत्मप्रशंसा करता है।
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