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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 56
महते योऽपकाराय नरस्य प्रभवेन्नरः । तेन वैरं समासज्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् ॥
जो मनुष्य का बहुत बड़ा अपकार कर सकता है, उस पुरुष के साथ बैर ठानकर, इस विश्वास पर निश्चिन्त न हो जाय कि मैं उससे दूर हूँ, (बह मेरा कुछ नहीं कर सकता)।
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