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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 58
प्रज्ञा शरेणाभिहतस्य जन्तोश् चिकित्सकाः सन्ति न चौषधानि । न होममन्त्रा न च मङ्गलानि नाथर्वणा नाप्यगदाः सुसिद्धाः ॥
जिस को बुद्धि के बाण से मारा गया है, उस जीव के लिये न कोई वैध्य है, न दवा है, न होम है, न मन्त्र है, न कोई माङ्गलिक कार्य, न अरथववेदोक्त प्रयोग, और न भलीं-भाँति सिद्ध जड़ी-बूटी ही है।
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