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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 60
अग्निस्तेजो महल्लोके गूढस्तिष्ठति दारुषु । न चोपयुङ्क्ते तद्दारु यावन्नो दीप्यते परैः ॥
महान संसार रूपी वनों में अग्नि और तेज छिपे हुए हैं। हम उस लकड़ी का उपयोग तब तक नहीं करते जब तक कि वह दूसरों के द्वारा जलाई न जाए।
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