वध्वा हासं श्वशुरो यश् च मन्यते वध्वा वसन्नुत यो मानकामः ।
परक्षेत्रे निर्वपति यश्च बीजं स्त्रियं च यः परिवदतेऽतिवेलम् ॥
श्वशुर होकर, पुत्र वधू के साथ परिहास पसन्द करता है, तथा पुत्र वधु से एकान्तवास करके भी, निर्भय होकर समाज में अपनी प्रतिष्ठा चाहता है, पर स्त्री में अपने वीर्य का आधान करता है, आवश्यकता से अधिक स्त्री की निन्दा करता है।
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